पहली पुण्यतिथि पर विशेष:


 ग़ज़लगुरु डॉ कृष्ण कुमार 'बेदिल'

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डॉ कृष्ण कुमार ‘बेदिल’ का जन्म 18 जुलाई 1943 को मुरादाबाद के चंदौसी में एक समृद्ध वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता स्व. राम स्वरूप रस्तोगी बडे कारोबारी थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी और उर्दू दोनों में हुई। कहते हैं- जो जितना योग्य होता है, उस पर उतनी ही जिम्मेदारियाँ आती हैं- यह जिम्मेदारी लेने वाले को नहीं बल्कि देने वाले को पता होता है। महज 14साल की उम्र में ही इन से पिता का शाया उठ गया। चचेरे बड़े भाई राधेश्याम रस्तोगी ने इनके परवरिश में कोई कसर न छोड़ी । वे इनसे उम्र में 15 साल बड़े थे, शेरो-शायरी का शौक रखते थे और मुशायरों में जाया करते थे। शायद, उनसे ही बालक कृष्ण कुमार को बचपन से ही शेरो- शायरी के प्रति लगाव हो गया होगा। 14-15 वर्ष की अवस्था आते-आते, इनकी डायरी में अच्छे अशआर संग्रहित हो गए थे।एसएम कॉलेज चंदौसी में साहित्य का अच्छा माहौल था। वहीं से इनका रचना-कर्म शुरू हुआ, जो अनवरत जारी रहा । पहले इन्होंने हिंदी में लिखना शुरू किया, फिर अपने उस्ताद हाशिम 'हाशिमी' के शागिर्दी में उर्दू में भी लिखा। इसी दौरान श्रीमती उर्मिला रस्तोगी इनकी जीवन संगीनी बनकर आयीं तो अशआर और वज़नदार होने लगे और इनकी पहली किताब ‘ मोम का घर’ ग़ज़ल संग्रह के रूप में आई। साहित्य-सेवा निर्बाध गति से चलती रही और दूसरा ग़ज़ल संग्रह 'हथेली पर सूरज ' हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुआ। इनका तीसरा ग़ज़ल संग्रह ‘पीली धूप’ हिंदी में प्रकाशित है।

साहित्य की हर विधा का अपना एक शिल्प है। इसी के द्वारा कवि या लेखक अपनी रचना को साकार रूप प्रदान करता है। ग़ज़ल वर्णिक छंद है जिसकी व्याकरणीय शुद्धता जानने की कसौटी उसकी बहर है। यह साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसमें स्वर विज्ञान (फोनेटिक्स) पर सबसे अधिक काम किया गया है। इसके लय-खंड एकदम नपे-तुले और नियमित होते हैं। संगीत और शब्दों का इतना अच्छा तालमेल कहीं देखने को नहीं मिलता। इसलिए, ग़ज़ल के शिल्प में तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है।ग़ज़ल के शिल्प पर इनकी दो किताबें 'ग़ज़ल रदीफ़ क़ाफ़िया और व्याकरण' और ग़ज़ल : अरूज़ के आईने में हैं, जो ग़ज़ल के विद्यार्थियों के लिए प्रामाणिक पुस्तकें हैं। इनमें ग़ज़ल की बारीकियों पर सप्रमाण सोदाहरण चर्चा की गई है। फ़न-ए-शायरी के शौकिन इनके शागीर्द भारत में ही नहीं बल्कि अमेरिका तक हैं।

ग़ज़ल अपने ख़ास लहज़े के कारण जानी जाती है जो ग़ज़लियत या तग़ज़्ज़ुल कहलाती है। तग़ज़्ज़ुल में शब्दों की असीमित ताकत बयान होती है। शब्दों के असीमित सामर्थ्य का बोध उसके प्रयोग पर निर्भर करता है। आम-फहम लफ्ज़ों में बड़ी बात कह देना, बड़ी बात है। बेदिल साहब इस फ़न में माहिर थे। इनका अंदाज़े -बयां अलैहिदा था जिसका अपना अलग चेहरा और पहचान है। इनकी ज़्यादातर ग़ज़लों का विषय तसव्वुफ़ है। इसलिए भाषा और साहित्य दोनों ही दृष्टि से बहुत आदर की चीज है। इनकी ग़ज़लों से इनकी उस्तादी का पूरा पूरा सबूत मिलता है। इनकी ग़ज़लों में दिल की कैफियत और ख्यालों को बड़े उम्दा ढंग से दिखाया गया है।

बनावट और तकल्लुफ के हिसाब से इनकी ग़ज़लों का जवाब नहीं! ग़ज़ल के लिए मीठी और घुली हुई ज़ुबान जान है और यह इनकी ग़ज़लों में मौजूद है। इनकी ग़ज़लों में सादगी और सफाई है और अशआर सीधे दिल में उतरते हैं। इनकी ग़ज़लों की गंभीरता और ऊंचाई आम स्तर से बेहद ऊंची है। मौजूदा जमाने की राजनीतिक और राष्ट्रीय घटनाओं को निहायत कामयाबी और शायराना असर के साथ बयान करना भी इनका एक हिस्सा था जिसमें ये रस्मी तौर से अपना साहित्यिक फ़र्ज़ पूरा नहीं करते, बल्कि अपनी आज़ाद राय का हर जगह ख्याल रखते थे ।

और, इतनी बारिकियों का ध्यान रखते हुए शायरी करना आसान कैसे हो सकता है-

एक मिसरे में गुज़र जाती हैं रातें कितनी,

इतना आसाँ नहीं दुनियाँ में सुखनवर होना।

 बेदिल की शायरी में उर्दू की कैफ़ियत और हिंदी की विलक्षनता दोनों है। ये गंगा-जमुनी तहज़ीब के शायर हैं:

शंख बजते रहें लेकिन यहाँ अज़ान भी हो,

सब हैं हिंदू-ओ-मुसलमाँ कोई इंसान भी हो।

 बेदिल बेशक अपने पिता के प्यार से महरूम रहे लेकिन इनकी शायरी ग़म में डूबी हुई शायरी नहीं है। इनमें एक बेफिक्री है, जो शायद दर्द के हद से गुजर जाने की एक इन्तिहाँ  है:

काफ़ी है तसल्ली को मय-ए- शायरी मेरी,

होठों को मेरे फ़िक्र-ए-ग़म-ए-ज़ाम नहीं है

बेदिल मुझे जिस नाम से जाने है ज़माना,

वो मेरा तखल्लुस है मेरा नाम नहीं है।

इनकी शायरी में बचपन की मासूमियत है तो जवानी का अक्खड़पन भी :

था जुनून-ए-शौक़ मेरा इस कदर सिर पर सवार

उंगलियों को बेचकर मैंने खरीदा एक सितार

समझ का ही तो सारा फ़लसफ़ा सुलझा नहीं पाए

कभी हम खुद नहीं समझे कभी समझा नहीं पाए

नए मिज़ाज के सांचे में ढल रही होगी,

परों को तोल के करवट बदल रही होगी

बुझाने आई थी आँधी कभी दिया मेरा

मुझे यकीन है अब हाथ मल रही होगी

जिंदगी के फ़लसफ़े को इन्होंने अपने आशआर में इस तरह बयान किया है:

जानते हैं हम दरख्तों का मिजाज

पत्ता-पत्ता फिर हरा हो जाएगा

मैं तो चलता ही रहा जानिबे-मंज़िल ताउम्र

मैंने दरियाओं से सीखा है समुंदर होना

एक पत्थर तो नीव में बैठा

एक फ़सीलों में सज के रहता है

जिसको किस्मत ने नेमतें बख्शी

वो कहीं हो बड़ा ही रहता है

 बेदिल का महबूब देश की मिट्टी है:

हमको प्यारी है वतन की मिट्टी

आज हाथों में ले के चूम लिया

 बेदिल को खेत में काम करने वाला मजदूर दिखाई देता है मेड़ पर बैठा हुआ जमींदार नहीं:

हाथों में फावड़ा है और मुंह पर थकान है,

बूढ़ा है ज़िस्म उसका ज़रूरत जवान है।

 बेदिल की शायरी में निराशा, हताशा, शिकवा शिकायत, रोना धोना ये सब नहीं दिखता, ज़ियादातर, बल्कि एक सकारात्मक ऊर्जा की ताज़गी लिए हुए अशआर मिलते हैं:

चलो एक और नया आसमाँ तामीर करें,

परों में और भी कुछ उड़ान बाकी है।

मत करो तुम हारने की कल्पनाएं

है अभी भी जीत की संभावनाएं

 बेदिल ने अपनी शायरी में जिंदगी की कई अनछुई पहलुओं का संज्ञान लिया है। इनकी शायरी परम्परागत  आधुनिक है।

ग़ज़ल का यह सितारा 13 फरवरी 2024 को इस दुनिया को अलविदा कह गया ।


श्रद्धांजलि! नमन!

 

संजीव प्रभाकर

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