पहली पुण्यतिथि पर विशेष: ग़ज़लगुरु डॉ कृष्ण कुमार 'बेदिल' ---------------------------------------- डॉ कृष्ण कुमार ‘बेदिल’ का जन्म 18 जुलाई 1943 को मुरादाबाद के चंदौसी में एक समृद्ध वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता स्व. राम स्वरूप रस्तोगी बडे कारोबारी थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी और उर्दू दोनों में हुई। कहते हैं- जो जितना योग्य होता है, उस पर उतनी ही जिम्मेदारियाँ आती हैं- यह जिम्मेदारी लेने वाले को नहीं बल्कि देने वाले को पता होता है। महज 14साल की उम्र में ही इन से पिता का शाया उठ गया। चचेरे बड़े भाई राधेश्याम रस्तोगी ने इनके परवरिश में कोई कसर न छोड़ी । वे इनसे उम्र में 15 साल बड़े थे, शेरो-शायरी का शौक रखते थे और मुशायरों में जाया करते थे। शायद, उनसे ही बालक कृष्ण कुमार को बचपन से ही शेरो- शायरी के प्रति लगाव हो गया होगा। 14-15 वर्ष की अवस्था आते-आते, इनकी डायरी में अच्छे अशआर संग्रहित हो गए थे।एसएम कॉलेज चंदौसी में साहित्य का अच्छा माहौल था। वहीं से इनका रचना-कर्म शुरू हुआ, जो अनवरत जारी रहा । पहले इन्होंने हिंदी में लिखना शुरू किया, फिर अपने उस्ताद हाशिम 'हाशिमी' के ...
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ग़ज़ल -------- निकल चले तो निकल चले हम बिना इजाज़त हमारा क्या है न कोई आगे न कोई पीछे हमारी बाबत, हमारा क्या है तुम्हारी दुनिया बहुत अलग है, हमारी दुनिया अलग है तुमसे तुम्हें मुबारक तुम्हारी दुनिया रहो सलामत, हमारा क्या है तलाश जारी रही युगों से है रूह अपनी कि जिस्म अपना, पता अभी तक नहीं चला है कि दर-हक़ीक़त हमारा क्या है हमें पता है नहीं था आसाँ वहाँ पहुँचना जहाँ कि तुम हो, तुम्हारी कोशिश तुम्हारी मिहनत तुम्हारी हिम्मत, हमारा क्या है फ़क़त रहे हैं हम एक जरिया जो कुछ हुआ है वो तय-शुदा था तुम्हें मयस्सर हुआ है जो कुछ तुम्हारी किस्मत, हमारा क्या है ✍️ संजीव प्रभाकर